'बैसरन खोल दो, हम ज़िंदा लाश बनकर रह गए...' पहलगाम हमले के बाद से बंदवैली, पोनीवालों का परिवार चलाना मुश्किल - Navbharat Times
पहलगाम हमला: सुरक्षा की पाबंदियों और भूख के बीच पिसती वादी, 'बैसरन' खोलने की उठी पुरजोर मांग
कश्मीर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पहलगाम में हुए आतंकी हमले के घाव आज भी हरे हैं। जहाँ एक ओर देश उन निर्दोषों को याद कर रहा है जिन्होंने इस हिंसा में अपनी जान गंवाई, वहीं दूसरी ओर स्थानीय आबादी एक अलग तरह की जंग लड़ रही है—अस्तित्व की जंग। हमले के बाद सुरक्षा कारणों से 'मिनी स्विट्जरलैंड' कहे जाने वाले बैसरन (Baisaran) और अन्य पर्यटन स्थलों पर लगाई गई पाबंदियों ने स्थानीय पोनीवालों (घोड़े वालों) और छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। आज स्थिति यह है कि वादी के ये मेहनतकश लोग खुद को 'जिंदा लाश' महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उनके सामने परिवार पालने का कोई दूसरा साधन शेष नहीं बचा है।
रोजी-रोटी का संकट: 'हम जिंदा लाश बनकर रह गए हैं'
पहलगाम हमले के बाद से प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं, लेकिन इन इंतजामों की सबसे बड़ी मार स्थानीय पोनीवालों पर पड़ी है। बैसरन वैली, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहती थी, वहां आवाजाही सीमित होने के कारण सैकड़ों परिवारों का चूल्हा बुझने की कगार पर है। स्थानीय निवासियों का दर्द छलक उठा है; उनका कहना है कि पर्यटन ही उनकी आय का एकमात्र स्रोत था। "बैसरन खोल दो, हम जिंदा लाश बनकर रह गए हैं," यह गुहार अब पहलगाम की गलियों में आम हो गई है। पोनीवालों का कहना है कि वे महीनों से खाली बैठे हैं और उनके घोड़ों के चारे तक के पैसे नहीं जुट पा रहे हैं। सुरक्षा के नाम पर उनकी आजीविका को लंबे समय तक रोकना उनके लिए मौत की सजा जैसा है।
शहादत की यादें और अनसुलझे सुरक्षा सवाल
इस त्रासदी के बीच उन नायकों की कहानियाँ भी हैं जिन्होंने दूसरों को बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। आदिल हुसैन की कहानी आज भी लोगों की आँखों में आँसू ला देती है, जिन्होंने पर्यटकों की जान बचाते हुए अपनी शहादत दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ितों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके बलिदान को याद किया। हालांकि, इस भावनात्मक माहौल के बीच सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार ने अब तक 'सुरक्षा में हुई चूक' पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है। साल भर बीत जाने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद आतंकी हमला कैसे हुआ और भविष्य के लिए क्या पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
सियासी खींचतान और सुरक्षा की चुनौतियां
पर्यटन स्थलों को फिर से पूरी तरह खोलने के मुद्दे पर राज्य की सियासत भी गरमाई हुई है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त की। मुख्यमंत्री के अनुसार, गृह मंत्रालय का मानना है कि अत्यधिक भीड़ वाले पर्यटन स्थलों को वर्तमान परिस्थितियों में खोलना इतना आसान नहीं है। गृह मंत्री ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए अत्यधिक सतर्कता बरतने की बात कही है। दूसरी ओर, स्थानीय प्रशासन और पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों का तर्क है कि यदि पर्यटन स्थलों को इसी तरह बंद रखा गया, तो इससे न केवल आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि अलगाव की भावना भी बढ़ सकती है। सरकार के लिए चुनौती अब सुरक्षा और सामान्य जनजीवन के बीच एक महीन संतुलन साधने की है।
निष्कर्ष: सुरक्षा के साथ समाधान की जरूरत
पहलगाम हमला केवल एक सुरक्षा विफलता नहीं थी, बल्कि यह उस भरोसे पर भी चोट थी जो पर्यटक और स्थानीय निवासी व्यवस्था पर करते हैं। लेकिन आज, जब हम इस हमले की बरसी मना रहे हैं, तो हमें उन लोगों की सुध भी लेनी होगी जो इस हमले के अप्रत्यक्ष शिकार हुए हैं। वर्ल्ड प्रेस इंडिया का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अनिवार्य है, लेकिन इसके कारण स्थानीय नागरिकों की आजीविका को अनिश्चितकाल के लिए बंधक नहीं बनाया जा सकता। सरकार को चाहिए कि वह आधुनिक तकनीक और उन्नत निगरानी तंत्र का उपयोग कर बैसरन जैसे स्थलों को सुरक्षित बनाए और वहां की रौनक वापस लौटाए, ताकि पहलगाम का गरीब पोनीवाला फिर से स्वाभिमान के साथ अपना जीवन यापन कर सके।
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