US-ईरान संघर्ष: ट्रंप ने बढ़ाया सीजफायर, पर जारी रहेगी नाकाबंदी, अब ईरान के प्रस्ताव का इंतजार - AajTak
US-ईरान तनाव: डोनाल्ड ट्रंप ने बढ़ाया सीजफायर, मगर 'आर्थिक घेराबंदी' और कड़े तेवरों ने बढ़ाई तेहरान की चिंता
वाशिंगटन और तेहरान के बीच जारी दशकों पुराने तनाव में एक नया और दिलचस्प मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रहे सैन्य संघर्ष में 'सीजफायर' (युद्धविराम) की अवधि को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। हालांकि, इस फैसले को पूरी तरह से शांति की दिशा में उठाया गया कदम कहना जल्दबाजी होगी। वर्ल्ड प्रेस इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि भले ही तोपों की गर्जना फिलहाल शांत रहे, लेकिन ईरान के खिलाफ सख्त आर्थिक नाकाबंदी और प्रतिबंध जारी रहेंगे। अब पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान इस 'राहत' के बदले में मेज पर क्या प्रस्ताव लेकर आता है।
राजनयिक दांव या सैन्य रणनीति: ट्रंप के फैसले के मायने
डोनाल्ड ट्रंप, जो अपनी पिछली रैलियों और बयानों में ईरान पर सख्त बमबारी की चेतावनी देते रहे हैं, उनका सीजफायर बढ़ाना कई कूटनीतिक सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ट्रंप की 'प्रेशर टैक्टिक्स' का हिस्सा है। सीजफायर बढ़ाकर अमेरिका ने ईरान को एक अवसर दिया है कि वह अपनी नीतियों में बदलाव करे, लेकिन साथ ही नाकाबंदी बरकरार रखकर उसकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने की रणनीति भी जारी रखी है। ट्रंप का यह इशारा साफ है कि जब तक ईरान और उसके वर्तमान नेतृत्व के साथ ठोस 'डील' नहीं होती, तब तक पूर्ण शांति की कल्पना करना असंभव है।
नाकाबंदी जारी: सैन्य शांति के बीच आर्थिक युद्ध की मार
सीजफायर की अवधि बढ़ने का मतलब यह कतई नहीं है कि ईरान के लिए मुश्किलें कम हो गई हैं। अमेरिका द्वारा लगाई गई सख्त नाकाबंदी ईरान के तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि सैन्य हमले से अधिक प्रभावी आर्थिक दबाव हो सकता है, जो ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर कर देगा। 'अमर उजाला' की रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरानी नेता केवल अपनी सत्ता बचाने की कोशिश कर रहे हैं, और जब तक वे अपनी क्षेत्रीय गतिविधियों को सीमित नहीं करते, यह घेराबंदी खत्म नहीं होगी।
मसूद पेजेशकियान और मोजतबा खामेनेई: पर्दे के पीछे की कहानी
ईरान के भीतर भी इस समय सत्ता के गलियारों में काफी हलचल है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के बयानों और ईरान की संप्रभुता को लेकर उनकी प्रतिबद्धता के कुछ घंटों बाद ही ट्रंप का यह फैसला आया। लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण नाम मोजतबा खामेनेई का उभरकर आ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पर्दे के पीछे चल रही इस कूटनीति में मोजतबा की भूमिका और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की दिलचस्पी ने इस संघर्ष को एक नया आयाम दे दिया है। पाकिस्तान इस क्षेत्र में स्थिरता चाहता है क्योंकि ईरान-अमेरिका संघर्ष का सीधा असर उसकी अपनी सीमाओं और सुरक्षा पर पड़ता है।
निष्कर्ष: ईरान के प्रस्ताव पर टिकी वैश्विक स्थिरता
अंततः, गेंद अब तेहरान के पाले में है। ट्रंप ने सीजफायर बढ़ाकर ईरान को सोचने का समय दिया है, लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों की तलवार अब भी लटकी हुई है। यदि ईरान एक ऐसा प्रस्ताव पेश करता है जो अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं को दूर कर सके, तो मध्य पूर्व में शांति की एक नई किरण देखी जा सकती है। हालांकि, ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व और ट्रंप के 'अनप्रेडिक्टेबल' स्वभाव को देखते हुए, यह कहना कठिन है कि यह सीजफायर स्थायी शांति में बदलेगा या यह आने वाले किसी बड़े तूफान से पहले की खामोशी है। भारत जैसे देशों के लिए, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं, इस तनाव का कम होना बेहद आवश्यक है।
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