AAP को झटका, राघव चड्ढा समेत 7 बागी सांसदों की बीजेपी में एंट्री को मिली राज्यसभा सभापति से मंजूरी - AajTak
भारतीय राजनीति में बड़ा उलटफेर: राघव चड्ढा समेत 'आप' के 7 सांसदों का भाजपा में प्रवेश, राज्यसभा सभापति की मिली मंजूरी
भारतीय राजनीति के गलियारों में उस समय एक बड़ा भूचाल आ गया जब आम आदमी पार्टी (AAP) के कद्दावर नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा समेत सात बागी सांसदों ने आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया। इस घटनाक्रम को तब और मजबूती मिली जब राज्यसभा के सभापति ने इन सांसदों की भाजपा में एंट्री को अपनी संवैधानिक मंजूरी दे दी। इस बड़े दलबदल ने न केवल आम आदमी पार्टी के भीतर एक गहरे संकट को जन्म दिया है, बल्कि उच्च सदन यानी राज्यसभा में संख्याबल के समीकरणों को भी पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।
संवैधानिक प्रक्रिया और सभापति की मुहर
लंबे समय से चल रही अटकलों पर विराम लगाते हुए राज्यसभा सचिवालय ने स्पष्ट किया कि राघव चड्ढा और उनके साथी सांसदों का भाजपा में शामिल होना नियमानुसार वैध पाया गया है। राज्यसभा सभापति द्वारा दी गई इस मंजूरी का अर्थ यह है कि अब ये सांसद सदन में भाजपा के सदस्य के रूप में पहचाने जाएंगे। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में सांसदों का एक साथ पाला बदलना दलबदल विरोधी कानून की पेचीदगियों को ध्यान में रखकर किया गया है, ताकि उनकी सदस्यता पर कोई आंच न आए। इस कदम से भाजपा अब राज्यसभा में और अधिक शक्तिशाली होकर उभरी है, जिससे महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सरकार को आसानी होगी।
AAP का कड़ा प्रहार: व्यक्तिगत जीवन पर साधा निशाना
अपने सबसे प्रमुख युवा चेहरे के जाने से आहत आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा पर तीखा हमला बोला है। पार्टी के प्रवक्ताओं ने इसे 'विश्वासघात' करार देते हुए चड्ढा के व्यक्तिगत जीवन को भी राजनीति में घसीट लिया। 'आप' की ओर से जारी बयानों में कहा गया कि राघव चड्ढा को पार्टी ने फर्श से अर्श तक पहुँचाया, लेकिन उन्होंने सत्ता के लालच में पीठ में छुरा घोंपा है। यहाँ तक कि पार्टी ने तंज कसते हुए यह भी कह दिया कि राघव चड्ढा की अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा से शादी भी शायद इसी राजनीतिक बिसात का हिस्सा थी या पार्टी के रसूख के कारण संभव हो पाई थी। पार्टी का यह रुख दिखाता है कि चड्ढा का जाना उनके लिए कितना बड़ा रणनीतिक और भावनात्मक झटका है।
विडंबना: अपने ही लाए बिल के जाल में उलझते चड्ढा
इस पूरे प्रकरण में एक दिलचस्प और विडंबनापूर्ण तथ्य यह सामने आया है कि कुछ समय पहले राघव चड्ढा ने स्वयं संसद में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था। इस बिल का उद्देश्य दलबदल विरोधी कानून को और सख्त बनाना था। चड्ढा के उस प्रस्ताव के अनुसार, यदि कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता है, तो उस पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। आज जब उन्होंने स्वयं भाजपा का दामन थामा है, तो सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में उनके उसी पुराने रुख की चर्चा हो रही है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि आज वह बिल कानून होता, तो राघव चड्ढा खुद छह वर्षों के लिए चुनावी राजनीति से बाहर हो जाते।
भाजपा का 'गुड बाय' तंज और कांग्रेस के लिए 'जैकपॉट'
भाजपा ने इन सांसदों का स्वागत बड़े उत्साह के साथ किया है। भाजपा के आधिकारिक हैंडल से 'गुड बाय टुकड़े-टुकड़े इंडी गठबंधन' लिखकर विपक्ष पर तंज कसा गया। भाजपा का मानना है कि राघव चड्ढा जैसे पढ़े-लिखे और युवा चेहरे के आने से पार्टी की पैठ शहरी युवाओं और पंजाब जैसे राज्यों में बढ़ेगी।
वहीं, दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 'आप' में मची यह भगदड़ भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में जहाँ 'आप' ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई थी, वहां अब कांग्रेस को अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का अवसर दिख रहा है। 'आप' के कमजोर होने से विपक्षी खेमे में कांग्रेस की मोलभाव करने की शक्ति बढ़ेगी और वह इन पांच राज्यों में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मजबूती से उभर सकती है।
भविष्य की राह और विपक्षी एकता पर सवाल
राघव चड्ढा और अन्य सांसदों का भाजपा में जाना केवल एक दल की हार नहीं है, बल्कि यह विपक्षी गठबंधन 'INDIA' की एकजुटता पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। एक तरफ जहां विपक्ष एकजुट होकर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है, वहीं दूसरी ओर गठबंधन के महत्वपूर्ण घटकों के भीतर ही टूट देखने को मिल रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी इस नुकसान की भरपाई कैसे करती है और क्या राघव चड्ढा भाजपा के भीतर अपनी वही साख बनाए रख पाएंगे जो उनकी 'आप' में थी। फिलहाल, भारतीय राजनीति की यह बिसात एक नए और रोमांचक मोड़ पर खड़ी है।
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