मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन: ईरान, खाड़ी देश और अमेरिका के बीच गहराता कूटनीतिक तनाव
मध्य पूर्व की भू-राजनीति वर्तमान में एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ तनाव और कूटनीति के बीच की रेखा बेहद धुंधली हो गई है। हालिया घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान न केवल क्षेत्रीय राजनीति का केंद्र बिंदु बना हुआ है, बल्कि उसकी नीतियां खाड़ी देशों के बीच एक वैचारिक और रणनीतिक विभाजन भी पैदा कर रही हैं। ईरान के प्रति खाड़ी देशों का नजरिया एक समान नहीं है; जहाँ कुछ देश अत्यधिक सख्त रुख अपनाए हुए हैं, वहीं कुछ मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए नरम रुख का समर्थन कर रहे हैं।
खाड़ी देशों का ध्रुवीकरण: कौन सख्त और कौन नरम?
ईरान के प्रति खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों का रवैया उनके अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा चिंताओं से प्रेरित है। सऊदी अरब और बहरीन को ऐतिहासिक रूप से ईरान के प्रति सबसे सख्त रुख रखने वाले देशों के रूप में देखा जाता रहा है। सऊदी अरब, ईरान को अपने क्षेत्रीय प्रभाव और धार्मिक नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती मानता है। हालांकि, चीन की मध्यस्थता के बाद सऊदी-ईरान संबंधों में जमी बर्फ कुछ पिघली है, लेकिन अविश्वास की भावना अब भी गहराई तक मौजूद है।
दूसरी ओर, ओमान और कतर जैसे देश ईरान के प्रति 'नरम' या संतुलित रुख अपनाते हैं। ओमान ने दशकों से पश्चिम और ईरान के बीच एक 'बैक-चैनल' या गुप्त दूत के रूप में काम किया है। कतर, जो ईरान के साथ दुनिया के सबसे बड़े गैस क्षेत्र को साझा करता है, हमेशा तनाव कम करने के पक्ष में रहता है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की स्थिति अधिक जटिल है; वह व्यापारिक मोर्चे पर ईरान के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन सामरिक मोर्चे पर ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं और क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क को लेकर अत्यंत सतर्क रहता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक अर्थव्यवस्था की दुखती रग
ईरान ने हाल ही में एक बड़ा कूटनीतिक दांव खेलते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को पूरी तरह खोलने और सहयोग करने की पेशकश की है, लेकिन इसके बदले में उसने अमेरिका के सामने कड़ी शर्तें रखी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन मार्ग है, जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। ईरान का दावा है कि वह क्षेत्रीय शांति के लिए इस मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने को तैयार है, बशर्ते अमेरिका उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को हटाए और उसकी नाकेबंदी समाप्त करे।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की यह पेशकश 'शांति के प्रस्ताव' से अधिक एक सामरिक चाल है। डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान 'अधिकतम दबाव' (Maximum Pressure) की नीति ने ईरान की अर्थव्यवस्था को काफी चोट पहुंचाई थी। अब, अमेरिका में राजनीतिक अस्थिरता और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच ईरान इस जलमार्ग को एक सौदेबाजी के चिप (Bargaining Chip) के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि, अमेरिका ने वर्तमान में इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है, जिससे टकराव की स्थिति जस की तस बनी हुई है।
80 घंटों की वार्ता और महायुद्ध की आहट
हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच परदे के पीछे से चलने वाली कूटनीति तेज हुई है। रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 80 घंटों की गहन चर्चा के बावजूद किसी स्थाई संघर्षविराम (Ceasefire) पर सहमति नहीं बन पाई है। इस वार्ता का मुख्य उद्देश्य मध्य पूर्व में एक बड़े युद्ध को रोकना था, जिसकी संभावना गाजा और लेबनान में चल रहे संघर्षों के कारण बढ़ गई है। ईरान समर्थित समूहों (Houthi, Hezbollah) की सक्रियता ने अमेरिका को क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है।
सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यदि स्थाई समाधान नहीं निकलता है, तो एक छोटी सी चिंगारी भी 'महायुद्ध' का रूप ले सकती है। अमेरिका का स्पष्ट रुख है कि वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी विस्तारवादी नीतियों पर कोई समझौता नहीं करेगा, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों को सर्वोपरि रख रहा है।
पाकिस्तान का 'डबल गेम' और बाहरी शक्तियों की भूमिका
इस पूरे क्षेत्रीय विवाद में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी हुई है। पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका से अपने सैन्य और आर्थिक संबंधों को सुधारने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण वह ईरान के साथ भी मधुर संबंध बनाए रखना चाहता है। आलोचकों का तर्क है कि पाकिस्तान 'शांति वार्ता' के बहाने अमेरिका और चीन के बीच 'डबल गेम' खेल रहा है। चीन, जो ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, क्षेत्र में शांति चाहता है ताकि उसके 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) को कोई नुकसान न हो। पाकिस्तान की कोशिश इस त्रिकोणीय संघर्ष में खुद को सुरक्षित रखने की है, लेकिन यह कूटनीतिक संतुलन उसे किसी बड़ी मुसीबत में भी डाल सकता है।
निष्कर्ष: भविष्य की राह
ईरान और खाड़ी देशों के बीच का यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक है। जहाँ एक ओर खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका की ओर देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे ईरान के साथ सीधे टकराव से भी बचना चाहते हैं। ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह झुकने को तैयार नहीं है और अपनी शर्तों पर ही बातचीत करेगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका कूटनीतिक लचीलापन दिखाता है या फिर 'अधिकतम दबाव' की नीति ही क्षेत्र के भविष्य को निर्धारित करेगी। फिलहाल, मध्य पूर्व एक ऐसे बारूद के ढेर पर बैठा है जहाँ शांति की उम्मीदें बेहद नाजुक हैं।
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