मध्य पूर्व में बदलता शक्ति संतुलन: ईरान के प्रति खाड़ी देशों का रुख और ट्रंप की 'सख्त' घेराबंदी
मध्य पूर्व की भू-राजनीति एक बार फिर से अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित किया है, बल्कि खाड़ी देशों (Gulf Countries) के बीच भी कूटनीतिक विभाजन को गहरा कर दिया है। जहाँ एक ओर अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के "पूरी तरह ढहने" का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर खाड़ी के देश अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों को देखते हुए अलग-अलग खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान के प्रति कौन सा खाड़ी देश सबसे सख्त रुख अपनाए हुए है और कौन सा देश मध्यस्थता के जरिए नरमी बरत रहा है।
खाड़ी देशों का रुख: कठोर बनाम नरम कूटनीति
ईरान के साथ संबंधों के मामले में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों का दृष्टिकोण एक समान नहीं है। सऊदी अरब और बहरीन को ऐतिहासिक रूप से ईरान के प्रति सबसे सख्त रुख रखने वाले देशों के रूप में देखा जाता रहा है। विशेष रूप से बहरीन, जो ईरान पर अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाता रहा है, तेहरान के प्रति बेहद सतर्क रहता है। हालांकि, हाल के वर्षों में चीन की मध्यस्थता के बाद सऊदी अरब और ईरान के बीच रिश्तों में जमी बर्फ कुछ हद तक पिघली है, लेकिन सुरक्षा चिंताओं को लेकर रियाद अभी भी बेहद सावधान है।
इसके विपरीत, ओमान और कतर को ईरान के प्रति सबसे 'नरम' या संतुलित रुख रखने वाले देशों में गिना जाता है। ओमान लंबे समय से तेहरान और वाशिंगटन के बीच एक 'बैक-चैनल' या मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। वहीं, कतर भी ईरान के साथ अपने गैस क्षेत्रों को साझा करता है, जिसके कारण वह सीधे टकराव के बजाय संवाद की नीति पर जोर देता है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का रुख व्यापारिक हितों और सुरक्षा के बीच एक जटिल संतुलन बनाने जैसा है; वह एक तरफ ईरान के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ उसकी क्षेत्रीय विस्तारवादी नीतियों का मुखर विरोधी भी है।
ट्रंप का नया दावा और 'होर्मुज' का सामरिक संकट
अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी की सुगबुगाहट के साथ ही ईरान पर दबाव की रणनीति तेज हो गई है। ट्रंप ने हालिया बयानों में दावा किया है कि ईरान आर्थिक और राजनीतिक रूप से "ढहने की कगार पर" है। ट्रंप का मुख्य ध्यान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर है, जो दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा ढोने वाला सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग है। ट्रंप का मानना है कि ईरान ने इस जलमार्ग को बंधक बना रखा है और वह इसे जल्द से जल्द पूरी तरह खुलवाना चाहते हैं।
ट्रंप के इन दावों पर ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि ट्रंप "मनोवैज्ञानिक युद्ध" का सहारा ले रहे हैं। हालांकि, यह भी सच है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और हाल के महीनों में इजरायल के साथ बढ़ते सैन्य टकराव ने ईरान की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर 2.0' की नीति ईरान को बातचीत की मेज पर लाने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन यह मार्ग संघर्ष के जोखिमों से भरा हुआ है।
ईरान की शर्तें और रूस का बढ़ता समर्थन
ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह दबाव में झुकने वाला नहीं है। तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के सुरक्षित संचालन और तनाव कम करने के लिए अमेरिका के सामने तीन प्रमुख शर्तें रखी हैं। हालांकि इन शर्तों का आधिकारिक विवरण गोपनीय रखा गया है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि इनमें प्रतिबंधों में ढील और क्षेत्रीय सुरक्षा की गारंटी शामिल है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने हाल ही में रूस के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कठिन समय में मास्को ने उनका साथ दिया है।
ईरान अब पश्चिम के बजाय पूर्व की ओर देख रहा है। रूस और चीन के साथ बढ़ते रक्षा और आर्थिक संबंध ईरान को वह संबल प्रदान कर रहे हैं, जिसकी बदौलत वह अमेरिकी प्रतिबंधों को झेलने का दावा कर रहा है। इजरायल और अमेरिका के हमलों के साये में 60 दिनों से अधिक समय से चल रहे तनाव के बीच, ईरान ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसकी परमाणु क्षमताएं और क्षेत्रीय प्रभाव अभी भी बरकरार हैं।
क्षेत्रीय अस्थिरता और भविष्य की राह
ईरान और अमेरिका के इस द्वंद्व में खाड़ी देश एक अत्यंत कठिन स्थिति में हैं। यदि तनाव युद्ध में बदलता है, तो इसकी सबसे बड़ी कीमत इन देशों को चुकानी होगी, क्योंकि उनकी तेल रिफाइनरियां और बुनियादी ढांचा सीधे निशाने पर आ सकते हैं। यही कारण है कि कुवैत और यूएई जैसे देश अब संघर्ष के बजाय कूटनीतिक समाधान पर अधिक जोर दे रहे हैं।
निष्कर्ष के तौर पर, यह स्पष्ट है कि ईरान के प्रति खाड़ी का कोई भी देश अब पूर्णतः शत्रुतापूर्ण रुख नहीं अपनाना चाहता, लेकिन ट्रंप की वापसी ने समीकरण बदल दिए हैं। होर्मुज का संकट केवल एक जलमार्ग का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई का प्रतीक बन गया है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ईरान अपनी शर्तों पर समझौता कर पाता है या ट्रंप की घेराबंदी तेहरान में सत्ता परिवर्तन या व्यवस्था परिवर्तन का आधार बनती है। विश्व प्रेस इंडिया की इस रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व का भविष्य अब कूटनीतिक मेज और युद्ध के मैदान के बीच झूल रहा है।
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