मध्य पूर्व में बदलती बिसात: ईरान की कूटनीति, खाड़ी देशों का रुख और अमेरिका के साथ 'महायुद्ध' की आहट
मध्य पूर्व की भू-राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं, खाड़ी देशों के साथ उसके जटिल संबंध और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ जारी तनातनी ने पूरे क्षेत्र को एक ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां कूटनीति और संघर्ष के बीच की रेखा बेहद धुंधली हो गई है। वर्ल्ड प्रेस इंडिया के इस विशेष विश्लेषण में हम उन कारकों की पड़ताल करेंगे जो न केवल ईरान के भविष्य को तय करेंगे, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को भी प्रभावित करेंगे।
खाड़ी देशों का ईरान के प्रति दृष्टिकोण: नरम बनाम सख्त
ईरान के प्रति खाड़ी देशों का रुख कभी भी एकसमान नहीं रहा है। क्षेत्रीय नेतृत्व की होड़ और धार्मिक-राजनीतिक विचारधाराओं ने इन देशों को अलग-अलग खेमों में बांट रखा है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पारंपरिक रूप से ईरान के प्रति सख्त रुख अपनाते रहे हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में चीन की मध्यस्थता के बाद रियाद और तेहरान के बीच संबंधों में कुछ सुधार देखा गया है, लेकिन अविश्वास की परतें अभी भी गहरी हैं।
दूसरी ओर, ओमान और कतर जैसे देश ईरान के प्रति 'नरम' या मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। ओमान दशकों से तेहरान और वाशिंगटन के बीच एक गुप्त पुल का काम करता रहा है। कुवैत का रुख भी तुलनात्मक रूप से संतुलित रहता है। इसके विपरीत, बहरीन ईरान के प्रति सबसे सख्त रुख रखने वाले देशों में से एक है, क्योंकि वह ईरान पर अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाता रहता है। खाड़ी के देशों के लिए चुनौती यह है कि वे ईरान को एक 'खतरे' के रूप में देखें या एक 'पड़ोसी' के रूप में, जिसके साथ व्यापारिक हितों को साधा जा सके।
अमेरिका-ईरान तनाव: क्या स्थाई सीजफायर संभव है?
हाल के दिनों में 80 घंटों के भीतर हुए घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर है। 'महायुद्ध' की आहट के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों देश किसी स्थाई सीजफायर या समझौते पर पहुंच सकते हैं? ईरान ने अमेरिका के सामने एक तीन सूत्रीय प्रस्ताव रखा है, जिसमें युद्ध की समाप्ति, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और परमाणु हथियारों के मुद्दे पर बातचीत शामिल है।
तेहरान का यह प्रस्ताव उसकी आर्थिक लाचारी और वैश्विक प्रतिबंधों से उपजी हताशा को दर्शाता है। ईरान जानता है कि उसकी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए प्रतिबंधों का हटना अनिवार्य है। वहीं, अमेरिका की शर्त स्पष्ट है कि ईरान को न केवल परमाणु कार्यक्रम रोकना होगा, बल्कि क्षेत्रीय उग्रवादी समूहों को समर्थन देना भी बंद करना होगा। इस कूटनीतिक गतिरोध के बीच स्थाई सीजफायर की संभावना फिलहाल कम ही नजर आती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक अर्थव्यवस्था की दुखती रग
ईरान की सबसे बड़ी ताकत और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकीर्ण रास्ते से गुजरता है। ईरान ने बार-बार इस मार्ग को बंद करने की धमकी दी है, जो वैश्विक बाजार के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान होर्मुज को खोलने के प्रस्ताव के जरिए अमेरिका को सौदेबाजी की मेज पर लाना चाहता है।
ईरान मजबूर है क्योंकि प्रतिबंधों के कारण उसका अपना तेल निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। यदि वह होर्मुज में कोई भी सैन्य कार्रवाई करता है, तो उसे न केवल अमेरिका बल्कि चीन और भारत जैसे देशों के गुस्से का भी सामना करना पड़ेगा, जो उसकी तेल बिक्री के प्रमुख गंतव्य रहे हैं।
ट्रंप की चेतावनी और रूस-ईरान गठजोड़
ईरान के विदेश मंत्री की हालिया रूस यात्रा ने पश्चिमी देशों, विशेषकर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नाराज कर दिया है। ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि यदि ईरान ने रूस के साथ अपनी सैन्य और ऊर्जा साझेदारी कम नहीं की, तो उसकी सारी पाइपलाइनें तबाह कर दी जाएंगी। ट्रंप का 'तीन दिन का अल्टीमेटम' ईरान पर 'अधिकतम दबाव' (Maximum Pressure) की नीति को फिर से लागू करने का संकेत है।
ईरान का रूस की ओर झुकना उसकी सामरिक विवशता है। यूक्रेन युद्ध के बीच रूस और ईरान के बीच ड्रोन और मिसाइल तकनीक का आदान-प्रदान बढ़ा है। यह नया 'एक्सिस' अमेरिका के लिए सिरदर्द बना हुआ है। यदि वाशिंगटन में सत्ता परिवर्तन होता है या रिपब्लिकन नीतियां प्रभावी होती हैं, तो ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
निष्कर्ष
ईरान इस समय एक दोराहे पर है। एक तरफ उसके पास कूटनीति का रास्ता है, जहां वह खाड़ी देशों के साथ संबंधों को सामान्य कर और अमेरिका के साथ तीन-सूत्रीय प्रस्ताव पर बात कर अपनी अर्थव्यवस्था को बचा सकता है। दूसरी तरफ संघर्ष का रास्ता है, जो न केवल ईरान को बल्कि पूरे मध्य पूर्व को तबाह कर सकता है। आगामी कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि 'होर्मुज' का पानी शांत रहेगा या फिर वहां से युद्ध की लहरें उठेंगी।
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