AAP को झटका, राघव चड्ढा समेत 7 बागी सांसदों की बीजेपी में एंट्री को मिली राज्यसभा सभापति से मंजूरी - AajTak
आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका: राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों का भाजपा में विलय, राज्यसभा सभापति की मिली हरी झंडी
भारतीय राजनीति के गलियारों में एक बड़ा भूचाल आ गया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के कद्दावर नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा समेत सात बागी सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने के प्रस्ताव को राज्यसभा सभापति ने आधिकारिक तौर पर मंजूरी दे दी है। इस फैसले के साथ ही संसद के उच्च सदन में समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट माना जा रहा है, क्योंकि पार्टी ने न केवल अपने प्रमुख चेहरों को खोया है, बल्कि सदन में उसकी ताकत भी काफी कम हो गई है।
संवैधानिक मंजूरी और दलबदल कानून की चुनौती
राज्यसभा सचिवालय से जारी अधिसूचना के अनुसार, बागी सांसदों के इस समूह ने नियमानुसार एक-तिहाई से अधिक की संख्या होने का दावा किया था, जिसके चलते उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की संभावनाएं सीमित हो गईं। सभापति ने सभी कानूनी पहलुओं की जांच के बाद इस विलय को अपनी स्वीकृति प्रदान की है। भाजपा के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है, क्योंकि राघव चड्ढा जैसे मुखर नेता का पार्टी में आना विपक्षी खेमे की धार को कुंद करने जैसा है।
राघव चड्ढा का अपना ही दांव पड़ा उल्टा?
राघव चड्ढा के भाजपा में शामिल होने पर सबसे अधिक चर्चा उनके उस पुराने प्रस्ताव की हो रही है, जिसे उन्होंने करीब चार साल पहले पेश किया था। गौरतलब है कि चड्ढा ने खुद दलबदल के खिलाफ एक निजी विधेयक (Private Member's Bill) लाने की वकालत की थी, जिसमें उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों के पार्टी बदलने पर कठोर प्रतिबंधों का सुझाव दिया था। आज जब वे स्वयं इस प्रक्रिया का हिस्सा बने हैं, तो सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में उनके पुराने बयानों और सिद्धांतों पर तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं। विरोधियों का कहना है कि राजनीति में 'अवसरवाद' ने सिद्धांतों की जगह ले ली है।
भाजपा का तंज: 'गुड बाय टुकड़े-टुकड़े इंडी गठबंधन'
इन सांसदों के स्वागत समारोह के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने विपक्षी गठबंधन पर जमकर निशाना साधा। भाजपा प्रवक्ताओं ने इसे 'इंडी गठबंधन' के अंत की शुरुआत बताया। भाजपा ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा, "गुड बाय टुकड़े-टुकड़े इंडी गठबंधन"। भाजपा का तर्क है कि आम आदमी पार्टी का आंतरिक ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है और पार्टी के भीतर लोकतंत्र खत्म हो गया है, जिसके चलते ईमानदार नेता वहां घुटन महसूस कर रहे थे। राघव चड्ढा के साथ अन्य सांसदों का आना यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री मोदी के विकास कार्यों में विपक्ष के नेताओं का भी विश्वास बढ़ रहा है।
कांग्रेस के लिए 'जैकपॉट' या नई चुनौती?
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इस टूट को भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लिए फायदेमंद मान रहा है। जानकारों के अनुसार, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में जहां आम आदमी पार्टी कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा रही थी, वहां अब कांग्रेस को दोबारा अपनी जमीन मजबूत करने का मौका मिल सकता है। 'आप' के कमजोर होने से विपक्षी खेमे में कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ेगी और उसे भाजपा के खिलाफ मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में खुद को स्थापित करने में मदद मिलेगी। विशेष रूप से पंजाब में, जहां 'आप' की सरकार है, इस बगावत का गहरा असर देखने को मिल सकता है।
अंदरूनी कलह की इनसाइड स्टोरी: क्यों टूटी पार्टी?
इस बड़ी टूट के पीछे केवल सत्ता का मोह नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर लंबे समय से पनप रहा असंतोष भी बताया जा रहा है। बागी गुट के करीबी सूत्रों का कहना है कि पार्टी में तीन बड़े नेताओं को लगातार साइडलाइन किया जा रहा था। जब निर्णय लेने की प्रक्रिया केवल एक या दो व्यक्तियों तक सीमित हो गई, तो सांसदों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा हुई। बागी सांसदों का आरोप है कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों 'स्वराज' और 'आंतरिक लोकतंत्र' से भटक गई है। भ्रष्टाचार के आरोपों और शीर्ष नेतृत्व की जेल यात्राओं ने भी सांसदों के मनोबल को प्रभावित किया, जिसके चलते उन्होंने सुरक्षित राजनीतिक भविष्य के लिए भाजपा का दामन थामना बेहतर समझा।
निष्कर्ष: आम आदमी पार्टी से सात सांसदों का जाना केवल संख्या बल का नुकसान नहीं है, बल्कि यह एक धारणा (Perception) की लड़ाई भी है। जहां भाजपा इसे अपनी नीतियों की जीत बता रही है, वहीं आम आदमी पार्टी इसे लोकतंत्र की हत्या और जांच एजेंसियों का दबाव करार दे रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राघव चड्ढा और उनके साथी भाजपा के भीतर अपनी कितनी जगह बना पाते हैं और अरविंद केजरीवाल इस बिखराव को रोकने के लिए क्या नई रणनीति अपनाते हैं।
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