Raghav Chadha News | राघव चड्ढा सहित आप के 7 बागी सांसदों पर राज्यसभा सचिवालय का बड़ा फैसला, बीजेपी के हुए ... - News18 Hindi
राज्यसभा में बड़ा राजनीतिक उलटफेर: राघव चड्ढा समेत AAP के 7 सांसदों का भाजपा में विलय, एनडीए की ताकत 148 के पार
भारतीय संसदीय राजनीति के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला अध्याय जुड़ गया है। आम आदमी पार्टी (आप) के कद्दावर नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के नेतृत्व में पार्टी के सात सांसदों ने पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया है। राज्यसभा सचिवालय ने इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम पर अपनी मुहर लगाते हुए इन सात बागी सांसदों के भाजपा में विलय को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस निर्णय के साथ ही उच्च सदन यानी राज्यसभा में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का आंकड़ा 148 तक पहुँच गया है, जो बहुमत के जादुई आंकड़े से कहीं अधिक है।
यह घटनाक्रम न केवल आम आदमी पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) के समीकरणों को भी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त करने वाला साबित हो रहा है। राज्यसभा चेयरमैन की ओर से मिली इस अनुमति के बाद अब इन सांसदों पर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की तलवार भी नहीं लटकेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम आगामी विधानसभा चुनावों और संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की दिशा में भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
संवैधानिक गणित और दलबदल विरोधी कानून की भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पहलू संवैधानिक प्रावधानों का है। भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के अनुसार, यदि किसी दल के दो-तिहाई सांसद या विधायक एक साथ अलग होकर किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द नहीं होती है। राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसद थे। संवैधानिक नियमों के तहत, दलबदल की कार्रवाई से बचने के लिए कम से कम 7 सांसदों (दो-तिहाई) का एक साथ आना अनिवार्य था।
राघव चड्ढा के नेतृत्व वाले इस गुट ने इसी तकनीकी बारीकी का लाभ उठाया। चूँकि 10 में से 7 सांसदों ने भाजपा में विलय का निर्णय लिया, इसलिए राज्यसभा सचिवालय ने इसे कानूनन वैध माना। यदि यह संख्या 7 से कम होती, तो इन सांसदों को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ती और वे छह साल तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य भी घोषित किए जा सकते थे। सचिवालय के इस फैसले ने अब विपक्षी खेमे में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि 'आप' अब सदन में एक छोटी शक्ति बनकर रह गई है।
NDA की बढ़ती ताकत और विपक्षी खेमे में सेंधमारी
राज्यसभा में 7 नए सदस्यों के जुड़ने से भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की शक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। अब एनडीए का आंकड़ा 148 तक पहुँच गया है। 245 सदस्यीय राज्यसभा में किसी भी सामान्य विधेयक को पारित कराने के लिए 123 सदस्यों की आवश्यकता होती है। इस नए समीकरण के बाद केंद्र सरकार को अब विवादास्पद या कड़े विधेयकों को पारित कराने के लिए छोटे क्षेत्रीय दलों जैसे बीजेडी या वाईएसआर कांग्रेस पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि राघव चड्ढा जैसे मुखर नेता का भाजपा में जाना केवल संख्या बल का खेल नहीं है, बल्कि यह एक 'पर्सेप्शन वॉर' यानी धारणा की लड़ाई भी है। चड्ढा को अरविंद केजरीवाल का बेहद करीबी माना जाता था। उनके जाने से यह संदेश गया है कि आम आदमी पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
कांग्रेस के लिए 'जैकपॉट': पांच राज्यों में बदलेंगे समीकरण
दिलचस्प बात यह है कि आम आदमी पार्टी में हुई इस बड़ी बगावत का सीधा फायदा भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस को भी मिलता दिख रहा है। राजनीतिक गलियारों में इसे "कांग्रेस के लिए जैकपॉट" कहा जा रहा है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में जहां 'आप' और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था या जहां 'आप' ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई थी, वहां अब कांग्रेस फिर से मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरने की कोशिश करेगी।
विशेष रूप से पंजाब और दिल्ली में, जहां आम आदमी पार्टी की सरकारें हैं, वहां इस फूट का असर संगठन पर पड़ना तय है। कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि अगर 'आप' कमजोर होती है, तो गैर-भाजपा विरोधी वोट जो पहले केजरीवाल की ओर जा रहा था, वह वापस कांग्रेस की झोली में आ सकता है। इन पांच राज्यों में कांग्रेस अब इस फूट का फायदा उठाकर खुद को एकमात्र विकल्प के रूप में पेश करने की तैयारी में है।
भविष्य की राजनीति और कानूनी चुनौतियां
हालांकि राज्यसभा सचिवालय ने विलय को मंजूरी दे दी है, लेकिन मामला अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। आम आदमी पार्टी के शेष नेतृत्व ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के संकेत दिए हैं। 'आप' का तर्क है कि यह विलय स्वेच्छा से नहीं बल्कि दबाव में किया गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पिछले कुछ फैसलों (जैसे महाराष्ट्र में शिव सेना और एनसीपी विवाद) को देखते हुए, बागी गुट का पलड़ा भारी नजर आता है, क्योंकि उनके पास आवश्यक दो-तिहाई बहुमत मौजूद है।
राघव चड्ढा और उनके साथियों के इस कदम ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। क्या विचारधारा पर आधारित राजनीति का दौर खत्म हो रहा है? या फिर क्षेत्रीय दलों की आंतरिक कलह उन्हें बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों में विलीन होने पर मजबूर कर रही है? कारण जो भी हो, फिलहाल दिल्ली से लेकर पंजाब तक की राजनीति में भाजपा ने अपनी पकड़ को और मजबूत कर लिया है, जबकि अरविंद केजरीवाल के सामने अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राघव चड्ढा को भाजपा में क्या बड़ी जिम्मेदारी मिलती है और आम आदमी पार्टी इस ऐतिहासिक क्षति की भरपाई कैसे करती है। फिलहाल, राज्यसभा की सीढ़ियों पर एनडीए की गूँज और भी बुलंद हो गई है।
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