कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन: सिद्धारमैया का इस्तीफा, 'संकटमोचक' डीके शिवकुमार संभालेंगे मुख्यमंत्री की कमान
कर्नाटक की राजनीति में पिछले कई महीनों से जारी कयासों पर अब विराम लग गया है। राज्य के दिग्गज नेता सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद से औपचारिक रूप से इस्तीफा दे दिया है, जिसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और अब तक उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे डीके शिवकुमार के अगले मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। कांग्रेस आलाकमान के इस फैसले ने दक्षिण भारत के इस महत्वपूर्ण राज्य में सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया को आधिकारिक रूप दे दिया है।
भावुक विदाई: '20 सालों में बहुत चिल्लाया, दिल पर मत लेना'
अपने इस्तीफे से पहले सिद्धारमैया ने कैबिनेट की आखिरी बैठक की अध्यक्षता की। इस दौरान माहौल काफी भावुक नजर आया। दशकों तक कर्नाटक की राजनीति के केंद्र में रहे सिद्धारमैया ने अपने मंत्रियों और सहयोगियों को संबोधित करते हुए कहा, "पिछले 20 सालों में मैंने आप लोगों पर बहुत चिल्लाया होगा, काम को लेकर सख्ती दिखाई होगी, लेकिन उसे दिल पर मत लेना। वह सब केवल प्रशासन और जनता के हित के लिए था।" बैठक के बाद मौजूद मंत्रियों ने बताया कि सिद्धारमैया की आंखों में नमी थी, जो उनके राजनीतिक जीवन के एक लंबे अध्याय के समापन का संकेत दे रही थी।
सिद्धारमैया ने यह भी खुलासा किया कि कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बदले राज्यसभा जाने और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, उन्होंने इसे विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। सिद्धारमैया ने स्पष्ट किया कि उनकी राजनीति राज्य की जनता के बीच रहकर ही पूरी होती है और वे फिलहाल दिल्ली जाने के इच्छुक नहीं हैं।
डीके शिवकुमार: 'संकटमोचक' से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर
कांग्रेस के 'ट्रबलशूटर' कहे जाने वाले डीके शिवकुमार के लिए यह पल उनकी लंबी राजनीतिक तपस्या का फल माना जा रहा है। 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की प्रचंड जीत के पीछे शिवकुमार की संगठनात्मक क्षमता और रणनीतिक कौशल को मुख्य कारण माना गया था। मुख्यमंत्री पद की रेस में शुरुआत से ही बने रहने वाले शिवकुमार ने अक्सर कहा है कि "सत्ता मांगी नहीं जाती, सत्ता छीनी जाती है।"
पार्टी सूत्रों के अनुसार, सरकार गठन के समय ही सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल के कार्यकाल का एक अलिखित समझौता हुआ था। हालांकि, समय से पहले हुए इस बदलाव के पीछे लोकसभा चुनावों के परिणाम और राज्य के आंतरिक समीकरणों को भी वजह माना जा रहा है। शिवकुमार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती आगामी नगर निकाय चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी को एकजुट रखने की होगी।
विपक्ष का कड़ा प्रहार: 'OBC राजनीति पर कांग्रेस बेनकाब'
सिद्धारमैया के इस्तीफे के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस केवल पिछड़ा वर्ग (OBC) के नाम पर राजनीति करती है, लेकिन जब नेतृत्व की बात आती है, तो वह पिछड़े वर्ग के नेताओं को किनारे कर देती है। भाजपा ने तंज कसते हुए कहा, "राहुल गांधी देशभर में जातिगत जनगणना और OBC अधिकारों का भाषण देते रह गए, और उनकी नाक के नीचे कर्नाटक के सबसे कद्दावर OBC मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली गई।"
भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने यह भी दावा किया कि कांग्रेस में अब दूरबीन से देखने पर भी कोई OBC मुख्यमंत्री नजर नहीं आता। विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है, ताकि आगामी चुनावों में कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके।
आगे की राह और राजनीतिक चुनौतियां
डीके शिवकुमार ऐसे समय में कमान संभाल रहे हैं जब राज्य में कई सिंचाई परियोजनाओं और गारंटी योजनाओं को लेकर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है। उनके लिए न केवल विपक्ष के हमलों का सामना करना चुनौतीपूर्ण होगा, बल्कि सिद्धारमैया खेमे के विधायकों को विश्वास में लेकर चलना भी अनिवार्य होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना कर्नाटक कांग्रेस में एक नए युग की शुरुआत है, जहां आक्रामक राजनीति और मजबूत संगठन पर अधिक जोर दिया जाएगा।
सिद्धारमैया का मुख्यमंत्री पद से हटना कर्नाटक की राजनीति में एक बड़े शून्य को जन्म दे सकता है, जिसे भरने की जिम्मेदारी अब शिवकुमार के कंधों पर है। फिलहाल, बेंगलुरु में राजभवन की हलचल बढ़ गई है और शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां जोरों पर हैं। पूरे देश की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि शिवकुमार का 'कर्नाटक मॉडल' शासन व्यवस्था में क्या नया बदलाव लेकर आता है।
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