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अमेरिका ने ईरान के भीतर सैन्य ठिकानों पर नए हमले किए - BBC

मध्य पूर्व में महायुद्ध की आहट: अमेरिका और ईरान के बीच सीधा सैन्य संघर्ष तेज, शांति समझौते पर टिकी दुनिया की निगाहें

नई दिल्ली/वाशिंगटन/तेहरान: मध्य पूर्व में दशकों से जारी तनाव अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। विश्व प्रेस इंडिया की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान की सीमाओं के भीतर स्थित रणनीतिक सैन्य ठिकानों पर विनाशकारी हवाई हमले किए हैं। यह कार्रवाई हाल के वर्षों में ईरान पर किया गया सबसे बड़ा और सीधा प्रहार माना जा रहा है। बीबीसी और अन्य अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के अनुसार, इन हमलों ने न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को हिलाकर रख दिया है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति और कूटनीतिक स्थिरता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बंदर अब्बास और सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी प्रहार

ताजा घटनाक्रम में अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने पुष्टि की है कि उसके लड़ाकू विमानों और मिसाइलों ने ईरान के भीतर कई उच्च-मूल्य वाले सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया है। इनमें प्रमुख रूप से ईरान का रणनीतिक बंदरगाह 'बंदर अब्बास' और वहां स्थित नौसैनिक बुनियादी ढांचे शामिल हैं। अमेरिकी खुफिया सूत्रों का दावा है कि इन ठिकानों का उपयोग लाल सागर और फारस की खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर हमलों की योजना बनाने के लिए किया जा रहा था।

अमेरिका ने न केवल भौतिक हमले किए हैं, बल्कि ईरान की पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी पर नए और कड़े प्रतिबंधों की भी घोषणा की है। वाशिंगटन का आरोप है कि यह संस्था होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में समुद्री व्यापार को बाधित करने और अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देने में शामिल रही है। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान की उस आर्थिक शक्ति को कमजोर करना है, जिसका उपयोग वह अपने क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को वित्तपोषित करने के लिए करता है।

ईरान की जवाबी कार्रवाई: अमेरिकी एयरबेस पर मिसाइल अटैक

अमेरिकी हमलों के कुछ ही घंटों बाद, ईरान ने अपनी 'बौखलाहट' और प्रतिरोध की शक्ति का प्रदर्शन करते हुए क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। 'आजतक' की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने इराक और पड़ोसी क्षेत्रों में स्थित अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाकर कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि उसकी संप्रभुता पर किसी भी हमले का जवाब उसी भाषा में दिया जाएगा।

इस जवाबी हमले ने युद्ध की आग को और भड़काने का काम किया है। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह सिलसिला नहीं रुका, तो यह एक पूर्ण विकसित क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसमें इजराइल, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी शामिल होने को मजबूर हो सकते हैं। बंदर अब्बास पर हुए नुकसान ने ईरानी नेतृत्व को सीधे टकराव के लिए प्रेरित किया है, जो अब तक केवल छद्म युद्ध (Proxy War) तक सीमित था।

ऐतिहासिक शांति समझौता: 60 दिनों का सीजफायर और ट्रंप की भूमिका

युद्ध की इस विभीषिका के बीच, कूटनीतिक गलियारों से एक बड़ी राहत भरी खबर भी सामने आ रही है। दैनिक भास्कर और नवभारत टाइम्स की रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक शांति समझौता तैयार किया गया है। इस समझौते के तहत दोनों देश 60 दिनों के युद्धविराम (Ceasefire) पर राजी हो गए हैं। हालांकि, इस समझौते की सफलता की अंतिम कुंजी नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में है।

प्रस्तावित समझौते की मुख्य शर्तें:

  • होर्मुज की सुरक्षा: ईरान अगले 30 दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य से बिछाई गई सभी समुद्री बारूदी सुरंगों (Mines) को हटाने पर सहमत हुआ है।
  • सैन्य ठहराव: दोनों पक्ष एक-दूसरे के ठिकानों पर हमले तुरंत बंद करेंगे।
  • प्रतिबंधों में ढील: यदि ईरान शर्तों का पालन करता है, तो अमेरिका उसके ऊर्जा क्षेत्र पर लगे कुछ प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से निलंबित कर सकता है।

राजनयिक सूत्रों का कहना है कि यह समझौता पर्दे के पीछे महीनों से चल रही बातचीत का परिणाम है, जिसे अब अंतिम रूप दिया गया है। ट्रंप की मंजूरी मिलते ही यह समझौता लागू हो जाएगा, जो मध्य पूर्व के लिए एक बड़ी राहत साबित हो सकता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत पर प्रभाव

अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते इस तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर देखा जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है, वहां अस्थिरता होने से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक मध्य पूर्व पर निर्भर हैं, यह स्थिति चिंताजनक है।

वर्ल्ड प्रेस इंडिया के संपादकीय विश्लेषण के अनुसार, यदि शांति समझौता सफल रहता है, तो वैश्विक बाजार में स्थिरता आएगी। लेकिन यदि ट्रंप ने इस पर वीटो कर दिया या ईरान अपनी शर्तों से पीछे हटा, तो दुनिया को एक नई आर्थिक मंदी और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें वाशिंगटन और तेहरान के अगले कदमों पर टिकी हैं। क्या यह केवल युद्ध की शांति है या एक नए युग की शुरुआत, यह आने वाले कुछ दिन तय करेंगे।

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