मध्य पूर्व में महायुद्ध की आहट: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सीधा सैन्य टकराव
मध्य पूर्व में दशकों से चल रहा शीत युद्ध अब एक अत्यंत खतरनाक और विस्फोटक मोड़ पर पहुँच गया है। हालिया घटनाक्रमों ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने पहली बार ईरान की सीमाओं के भीतर स्थित सैन्य ठिकानों पर सीधे हमले किए हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन ने इन हमलों की पुष्टि करते हुए इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बताया है। यह घटनाक्रम इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अब तक दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ छद्म युद्ध (Proxy War) में शामिल थे, लेकिन सीधे हमले ने इस संघर्ष के 'पूर्ण युद्ध' में बदलने की आशंका बढ़ा दी है।
ईरान का पलटवार: अमेरिकी एयरबेस पर ताबड़तोड़ हमले
अमेरिकी हमले के जवाब में ईरान ने भी कड़ा रुख अख्तियार किया है। हिंदुस्तान हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी एयरबेस पर मिसाइलों से ताबड़तोड़ हमले किए हैं। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने अपनी आक्रामक गतिविधियां बंद नहीं कीं, तो इसका परिणाम और भी भयावह होगा। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि इन हमलों के बाद से पूरे क्षेत्र में रेड अलर्ट घोषित कर दिया गया है। सैन्य जानकारों का मानना है कि दोनों देशों के बीच यह 'डायरेक्ट फायर' का दौर वैश्विक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है, जिससे तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार मार्गों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है।
राजनयिक स्तर पर हलचल: होर्मुज जलडमरूमध्य और नाकेबंदी का खेल
जंग की इन खबरों के बीच कूटनीतिक गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ईरान पर लगी आर्थिक नाकेबंदी को हटाने पर विचार कर सकता है, लेकिन इसके बदले में उसने एक कड़ी शर्त रखी है। अमेरिका चाहता है कि ईरान सामरिक रूप से महत्वपूर्ण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खुला रखे और किसी भी प्रकार की सैन्य बाधा उत्पन्न न करे। ज्ञात हो कि दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकीर्ण समुद्री मार्ग से गुजरता है। यदि ईरान इसे बंद करने की धमकी देता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तेहरान अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए इस समझौते पर राजी होता है या सैन्य टकराव का रास्ता चुनता है।
क्षेत्रीय तनाव और संघर्षविराम पर मंडराता खतरा
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते इस तनाव का असर पड़ोसी देशों पर भी पड़ रहा है। लेबनान में इस्राइली हमलों में अचानक तेजी आई है, जिससे वहां चल रहे अस्थायी संघर्षविराम के टूटने का खतरा पैदा हो गया है। ईरान समर्थित गुटों ने पूरे क्षेत्र में अमेरिकी और इस्राइली ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि यह केवल दो देशों की जंग नहीं है, बल्कि यह एक बहुआयामी संघर्ष है जिसमें सीरिया, इराक, लेबनान और यमन भी शामिल हो सकते हैं। लेबनान में बढ़ती हिंसा इस बात का संकेत है कि युद्ध की लपटें अब इजरायल-हमास संघर्ष से आगे निकलकर एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले रही हैं।
इतिहास के पन्नों में अमेरिका-ईरान दुश्मनी की जड़ें
एबीपी न्यूज़ ने इस टकराव के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि अमेरिका और ईरान के बीच यह दुश्मनी नई नहीं है। इसकी शुरुआत 1979 की ईरानी क्रांति से हुई थी, जब ईरान में अमेरिकी दूतावास को बंधक बना लिया गया था। तब से लेकर आज तक, परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध और मध्य पूर्व में प्रभुत्व की जंग ने इन दोनों देशों को जानी दुश्मन बना रखा है। 2020 में जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद से यह तनाव चरम पर था, जो अब सीधे हमलों के रूप में परिणत हो चुका है। इतिहास गवाह है कि जब भी इन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है, उसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ा है।
वैश्विक प्रभाव और भविष्य की चुनौतियां
वर्ल्ड प्रेस इंडिया के संपादकीय विश्लेषण के अनुसार, यदि यह युद्ध नहीं रुका, तो इसके परिणाम विनाशकारी होंगे। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक मध्य पूर्व पर निर्भर हैं, यह स्थिति चिंताजनक है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर महंगाई को बढ़ाएगा। इसके अलावा, रेड सी और होर्मुज में बढ़ता तनाव समुद्री व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा पैदा कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ, दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल शांति की संभावनाएं धुंधली नजर आ रही हैं। अमेरिका में आगामी चुनावों और ईरान की आंतरिक राजनीतिक स्थिति को देखते हुए, दोनों ही पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि दुनिया एक और बड़े युद्ध की गवाह बनेगी या कूटनीति इस संकट का समाधान निकाल पाएगी।
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