महुआ मोइत्रा, मनोज झा, सुप्रिया सुले और केसी वेणुगोपाल दौड़े-दौड़े सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए, उल्टे पांव लौटना पड़ा - Navbharat Times
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर विपक्ष को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका: 2023 के नए कानून पर रोक लगाने से इनकार
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में चुनाव आयोग की निष्पक्षता हमेशा से एक केंद्रीय विषय रही है। हाल ही में, विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं—महुआ मोइत्रा, मनोज झा, सुप्रिया सुले और केसी वेणुगोपाल—द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 की वैधता को चुनौती देने वाली इन याचिकाओं पर कोर्ट ने फिलहाल कोई भी अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। इस फैसले को विपक्षी खेमे के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है, जो केंद्र सरकार द्वारा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में किए गए बदलावों का विरोध कर रहे थे।
क्या है विवाद की मुख्य जड़?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब केंद्र सरकार ने 2023 में एक नया कानून पारित किया, जिसने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी चयन समिति की संरचना को बदल दिया। इससे पहले, मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने आदेश दिया था कि चुनाव आयुक्तों का चयन एक समिति द्वारा किया जाना चाहिए जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल हों। हालांकि, नए कानून (2023 अधिनियम) ने मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से हटाकर उनकी जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया।
विपक्ष का तर्क है कि इस बदलाव से चयन समिति में सरकार का बहुमत (2-1) हो गया है, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह कानून 'शक्तियों के पृथक्करण' के सिद्धांत का उल्लंघन करता है और चुनाव प्रक्रिया की शुचिता को खतरे में डालता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और 'स्टे' न देने का कारण
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि वे वर्तमान चरण में कानून के कार्यान्वयन पर रोक नहीं लगाएंगे। कोर्ट ने कहा कि चुनाव अब बिल्कुल करीब हैं और इस समय नियुक्तियों को रद्द करना या कानून पर रोक लगाना केवल अराजकता और अनिश्चितता पैदा करेगा। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सामान्यतः कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर तब तक रोक नहीं लगाई जाती जब तक कि वह प्रथम दृष्टया असंवैधानिक न प्रतीत हो।
अदालत ने यह भी कहा कि नवनियुक्त चुनाव आयुक्तों—ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू—के खिलाफ कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं हैं। चयन प्रक्रिया में तेजी लाए जाने पर कोर्ट ने सवाल जरूर उठाए, लेकिन यह स्पष्ट किया कि केवल प्रक्रियात्मक जल्दबाजी के आधार पर पूरी नियुक्ति को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: 'काला दिन' बनाम 'संवैधानिक जीत'
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख पर देश की राजनीति दो ध्रुवों में बंट गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस फैसले पर निराशा व्यक्त की। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए एक 'काला दिन' करार देते हुए कहा कि यदि चयन प्रक्रिया में कार्यपालिका का वर्चस्व रहेगा, तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाएगी। भूषण ने तर्क दिया कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले के प्रभाव को खत्म करने के लिए यह कानून बनाया है।
दूसरी ओर, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। सरकार का पक्ष है कि संसद को कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है और नई प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है। सरकारी वकीलों ने दलील दी कि चुनाव आयुक्तों का चयन अत्यंत अनुभवी अधिकारियों के पैनल से किया गया है और इसमें विपक्ष के नेता की भागीदारी सुनिश्चित की गई है।
चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर भविष्य के सवाल
भले ही सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर तत्काल रोक नहीं लगाई है, लेकिन उसने इस मामले की गहराई से समीक्षा करने का निर्णय लिया है। याचिकाओं को अभी खारिज नहीं किया गया है, बल्कि उन पर विस्तृत सुनवाई भविष्य में जारी रहेगी। 'कागज नहीं दिखाएंगे' जैसे नारों और चुनावी पारदर्शिता के मुद्दों के बीच, यह कानूनी लड़ाई आने वाले समय में भारतीय चुनाव प्रणाली की दिशा तय करेगी।
इस फैसले का सीधा प्रभाव आगामी चुनावों के प्रबंधन पर पड़ेगा। वर्तमान में, चुनाव आयोग अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रहा है, लेकिन चयन समिति के ढांचे को लेकर उठ रहे संवैधानिक सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। क्या कार्यपालिका द्वारा नियुक्त अधिकारी पूर्णतः स्वतंत्र होकर कार्य कर पाएंगे? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर केवल भविष्य के चुनावी संचालन और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय से ही मिल पाएगा। फिलहाल के लिए, विपक्षी नेताओं को बिना किसी राहत के 'उल्टे पांव' लौटना पड़ा है, और सरकार की नई नियुक्ति प्रक्रिया को न्यायिक कवच प्राप्त हो गया है।
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