ममता बनर्जी का एक और करीबी ने छोड़ा साथ, 1 हफ्ते में राज्यसभा से दूसरे सांसद का इस्तीफा - Hindustan Hindi News
ममता बनर्जी के किले में बड़ी सेंध: टीएमसी में मची भगदड़, सायोनी घोष समेत कई दिग्गजों ने छोड़ा साथ
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली इस पार्टी में अंतर्कलह और बगावत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले एक हफ्ते के भीतर राज्यसभा से दूसरे सांसद का इस्तीफा होना यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। ममता बनर्जी के भरोसेमंद और करीबी माने जाने वाले नेताओं का एक-एक कर साथ छोड़ना न केवल सांगठनिक कमजोरी को दर्शाता है, बल्कि आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिए भी एक बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।
एक हफ्ते में दो राज्यसभा सांसदों का इस्तीफा: संकट में टीएमसी
तृणमूल कांग्रेस को ताजा झटका तब लगा जब पार्टी के एक और करीबी राज्यसभा सांसद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि एक सप्ताह के भीतर यह दूसरा बड़ा इस्तीफा है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। इन इस्तीफों ने पार्टी आलाकमान को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। जानकारों का मानना है कि सांसदों का यह मोहभंग पार्टी की आंतरिक कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रिया के प्रति बढ़ते असंतोष का परिणाम है। लगातार होते इन इस्तीफों ने टीएमसी की संसदीय ताकत को सीधे तौर पर प्रभावित किया है।
सायोनी घोष की बगावत: अभिषेक बनर्जी के करीबी भी हुए दूर
पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका सायोनी घोष का बागी गुट में शामिल होना माना जा रहा है। सायोनी घोष, जिन्हें अभिषेक बनर्जी ने खुद आगे बढ़ाया था और पार्टी की यूथ विंग का प्रमुख बनाया था, अब ममता बनर्जी के खिलाफ खड़ी हो गई हैं। सायोनी घोष न केवल एक युवा चेहरा थीं, बल्कि अपने तीखे बयानों और 'काबा-मदीना सॉन्ग' विवाद को लेकर भी चर्चा में रही हैं। उनका बागी तेवर अपनाना यह दर्शाता है कि अभिषेक बनर्जी द्वारा तैयार की गई नई पीढ़ी की लीडरशिप भी अब पार्टी के पुराने ढांचे से खुश नहीं है।
आंकड़ों में तबाही: अब तक 58 विधायक और 20 सांसद हुए अलग
अगर टीएमसी में मची इस टूट के आंकड़ों पर गौर करें, तो स्थिति बेहद भयावह नजर आती है। रिपोर्ट के मुताबिक, ममता बनर्जी के कुनबे से अब तक 58 विधायक और 20 लोकसभा सांसद अलग हो चुके हैं। इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों का अलग होना किसी भी राजनीतिक दल के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा सकता है। यह महज व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि एक संगठित विद्रोह की तरह नजर आ रहा है, जो धीरे-धीरे पार्टी की जड़ों को खोखला कर रहा है।
लोकसभा में फंसा कानूनी पेच और 91वें संशोधन की चुनौती
टीओमीसी के 20 सांसदों की बगावत ने अब एक कानूनी और संवैधानिक संकट भी खड़ा कर दिया है। इस पूरे प्रकरण में लोकसभा स्पीकर की चुप्पी ने कई सवाल पैदा किए हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ 91वें संविधान संशोधन के नियमों का हवाला दे रहे हैं, जिसके तहत दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) लागू होता है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये बागी सांसद अपनी सदस्यता बचा पाएंगे या उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। स्पीकर का अगला कदम ही यह तय करेगा कि पश्चिम बंगाल की राजनीति किस दिशा में मुड़ेगी और क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी को पूरी तरह बिखरने से बचा पाएंगी।
निष्कर्ष
ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन और कड़े फैसलों का है। एक ओर जहां अनुभवी नेता साथ छोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर युवा नेतृत्व भी बागी हो चला है। यदि पार्टी के भीतर इस असंतोष को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की सत्ता का संघर्ष टीएमसी के लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। फिलहाल, सबकी निगाहें दिल्ली और कोलकाता के बीच चल रही इस राजनीतिक बिसात पर टिकी हैं।
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