ईरान का दावा, 'क्षेत्र के अमेरिकी ठिकानों को बनाया निशाना', समझौते के 10 दिन बाद ही अमेरिका-ईरान फिर आमने-सामने - BBC
ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम का अंत: क्षेत्र में भीषण सैन्य टकराव और रणनीतिक तनाव
तेहरान/वाशिंगटन: मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदों को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। केवल 10 दिन पहले हुए युद्धविराम समझौते के बावजूद, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँच गया है। ईरान ने आधिकारिक तौर पर दावा किया है कि उसने क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है, जिसके जवाब में अमेरिका ने भी ईरानी मिसाइल और ड्रोन केंद्रों पर ताबड़तोड़ हमले किए हैं। इस नए घटनाक्रम ने पूरे क्षेत्र को एक भीषण युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
समझौते के दसवें दिन ही टूटा शांति का भ्रम
हाल के घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान और अमेरिका के बीच कूटनीतिक रास्ते फिलहाल बंद हो चुके हैं। 10 दिन पूर्व जिस समझौते को वैश्विक स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा था, वह अब पूरी तरह धराशायी हो चुका है। ईरान के अनुसार, अमेरिकी सेना ने क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को कम करने के वादे को पूरा नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें यह कठोर कदम उठाना पड़ा। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के बयानों के अनुसार, यह कार्रवाई उनकी राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए की गई है। वहीं, अमेरिकी रक्षा विभाग 'पेंटागन' ने इन दावों को उकसावे की कार्रवाई बताते हुए कड़ी निंदा की है।
ईरान के मिसाइल और ड्रोन ठिकानों पर अमेरिकी एयरस्ट्राइक
पेंटागन के सूत्रों के हवाले से खबर है कि अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन ईरान के सामरिक ठिकानों पर बड़े हमले किए हैं। अमेरिकी बमवर्षकों ने ईरान के उन गुप्त केंद्रों को निशाना बनाया है जहाँ से ड्रोन और मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें संचालित की जा रही थीं। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि वे ईरान को ऐसी क्षमता विकसित करने से रोकेंगे जो अमेरिकी हितों या उनके सहयोगियों के लिए खतरा पैदा करती हो। इन हमलों में जान-माल के नुकसान की सटीक जानकारी अभी आनी बाकी है, लेकिन सैटेलाइट तस्वीरों और स्थानीय रिपोर्टों से पता चलता है कि ईरान के कई लॉन्च पैड और भंडारण केंद्रों को भारी क्षति पहुँची है।
राजनीतिक बयानबाजी और 'वजूद मिटाने' की धमकी
इस सैन्य संघर्ष के बीच वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों से आने वाले बयानों ने आग में घी डालने का काम किया है। रिपब्लिकन नेता और उप-राष्ट्रपति पद के दावेदार जेडी वेंस ने ईरान को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि "हिंसा का जवाब केवल और केवल हिंसा से दिया जाएगा।" वेंस के इस बयान ने संकेत दिया है कि भविष्य में अमेरिकी रुख और भी आक्रामक हो सकता है। दूसरी ओर, पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान के वजूद को लेकर चेतावनी दी है। ट्रंप के अनुसार, यदि ईरान ने अपनी सीमाएं पार कीं, तो उसे ऐसे परिणामों का सामना करना पड़ेगा जिन्हें इतिहास ने कभी नहीं देखा। इन बयानों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों के बीच चिंता पैदा कर दी है कि क्या अब शांति की कोई गुंजाइश बची है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: नया रणनीतिक रणक्षेत्र
सामरिक दृष्टि से, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) एक बार फिर दुनिया का सबसे संवेदनशील केंद्र बन गया है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत इसी संकीर्ण रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान ने संकेत दिए हैं कि यदि अमेरिका ने अपनी 'अवैध' कार्रवाई बंद नहीं की, तो वह इस समुद्री मार्ग को बाधित कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आएगा और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। अमेरिका ने भी अपनी नौसेना की उपस्थिति को खाड़ी क्षेत्र में बढ़ा दिया है, जिससे टकराव की आशंका और प्रबल हो गई है।
खतरे में वैश्विक सुरक्षा और आगामी चुनौतियां
संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने दोनों पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि 10 दिनों के भीतर समझौते का टूट जाना यह दर्शाता है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई कितनी गहरी है। वर्तमान स्थिति केवल दो देशों का टकराव नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए खतरा है। यदि यह संघर्ष और आगे बढ़ता है, तो इसमें इजरायल, लेबनान और अन्य खाड़ी देशों के भी शामिल होने की पूरी संभावना है, जो एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है।
वर्ल्ड प्रेस इंडिया के विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान स्थिति शीत युद्ध के बाद के सबसे कठिन दौर में है। अमेरिका जहाँ अपनी सैन्य श्रेष्ठता साबित करने पर तुला है, वहीं ईरान अपनी 'प्रतिरोध की धुरी' को कमजोर नहीं होने देना चाहता। आने वाले कुछ दिन वैश्विक शांति के लिए अत्यंत निर्णायक साबित होने वाले हैं। क्या कूटनीति को एक और मौका मिलेगा या मिसाइलों की गूँज ही भविष्य का फैसला करेगी, यह देखना अभी बाकी है।
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