अमित शाह के 'धर्मशाला' बयान पर घमासान: 'वसुधैव कुटुंबकम' की अवधारणा पर सवाल
नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में बयानबाजी का दौर हमेशा गर्म रहता है, और हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान ने नए सिरे से बहस छेड़ दी है। शाह के 'धर्मशाला' वाले बयान पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। झा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि वे 'वसुधैव कुटुंबकम' का नारा लगाना छोड़ दें, यदि उनकी सरकार के कृत्य और बयान इस सार्वभौमिक सिद्धांत के विपरीत हैं।
अमित शाह ने किस संदर्भ में 'धर्मशाला' शब्द का प्रयोग किया, इसका पूरा विवरण अभी सार्वजनिक रूप से विस्तृत नहीं है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि उनका इशारा भारत को एक ऐसे स्थान के रूप में प्रस्तुत करने की ओर था जहाँ विभिन्न समुदायों और विचारों का स्वागत किया जाता है या उन्हें अस्थायी आश्रय मिलता है। हालांकि, मनोज झा ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि यदि सरकार की नीतियाँ और कार्यवाही कुछ विशेष समूहों या व्यक्तियों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं, तो 'वसुधैव कुटुंबकम' जैसे आदर्शवादी सिद्धांतों का प्रयोग केवल पाखंड है। 'वसुधैव कुटुंबकम' का अर्थ है 'पूरी पृथ्वी एक परिवार है', जो भारत की प्राचीन संस्कृति और विदेश नीति का एक मूलभूत स्तंभ रहा है। झा ने तर्क दिया कि जब देश के भीतर ही विभाजनकारी नीतियां लागू की जा रही हों, तब वैश्विक भाईचारे की बात करना निरर्थक है। उनका यह बयान मौजूदा सरकार की नागरिकता संशोधन कानून (CAA), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) जैसे मुद्दों पर रही नीतियों और अल्पसंख्यकों तथा अप्रवासियों के प्रति कथित दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है।
मनोज झा का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक समरसता को लेकर बहस तेज है। विपक्ष लगातार सरकार पर आरोप लगाता रहा है कि वह अपने कार्यों से संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना का उल्लंघन कर रही है। 'वसुधैव कुटुंबकम' केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और उसके नैतिक मूल्यों का प्रतीक रहा है। ऐसे में, इस पर सवाल उठना न केवल घरेलू राजनीति, बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। यह दर्शाता है कि विपक्ष सरकार की कथनी और करनी के अंतर को उजागर करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता।
नेपाल में विनाशकारी बाढ़ और भारत पर इसका गंभीर असर
जहां एक ओर देश में राजनीतिक बयानबाजी जारी है, वहीं पड़ोसी देश नेपाल में अचानक आई बाढ़ ने भयंकर तबाही मचाई है, जिसका सीधा असर भारत के सीमावर्ती राज्यों पर भी पड़ रहा है। नेपाल की नदियों में आई यह प्रलयंकारी बाढ़, विशेष रूप से गंडक नदी में, भारत के उत्तरी बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों के लिए भी खतरा बन गई है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल में आई अचानक बाढ़ में अब तक 291 विदेशी पर्यटक लापता बताए जा रहे हैं, जिनमें 105 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। यह संख्या चिंताजनक है और दोनों देशों के बीच मानवीय संकट के समय में सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती है। नेपाल में भारी बारिश के कारण नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ा है, जिससे बड़े पैमाने पर भूस्खलन और निचले इलाकों में जलभराव हुआ है।
भारत में, बिहार राज्य हाई अलर्ट पर है, खासकर गंडक नदी के किनारे बसे छह जिले। इन जिलों में बाढ़ की आशंका के मद्देनजर राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) की टीमें तैनात कर दी गई हैं। महाराजगंज सहित सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशासन ने सतर्कता बढ़ा दी है और गंडक नदी के जलस्तर की 24 घंटे निगरानी की जा रही है। आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं ताकि लोग किसी भी अप्रिय स्थिति में सहायता प्राप्त कर सकें। बिहार और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में पहले भी गंडक नदी ने भयंकर तबाही मचाई है, और इस बार भी बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है, जिससे हजारों लोगों के जीवन और आजीविका पर संकट गहरा गया है।
यह प्राकृतिक आपदा 'वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांत की वास्तविक कसौटी है, जहाँ भारत को अपने पड़ोसी के प्रति मानवीय सहायता और अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्पर रहना होगा। राजनीतिक बयानबाजी के बीच, प्राकृतिक आपदाएं हमें याद दिलाती हैं कि क्षेत्रीय सहयोग और मानवीय मूल्यों की रक्षा कितनी महत्वपूर्ण है।
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