नेपाल में विनाशकारी बाढ़: विनाश का तांडव, कारणों पर गहरे सवाल और भारत की चुनौतियाँ
काठमांडू/नई दिल्ली: हिमालय की गोद में बसे पड़ोसी देश नेपाल इन दिनों भीषण बाढ़ और भूस्खलन की विनाशकारी चपेट में है। मूसलाधार बारिश ने देश के कई हिस्सों में प्रलय मचा दी है, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। हजारों लोग बेघर हुए हैं, सैकड़ों गाँव जलमग्न हो गए हैं और दर्जनों लोगों की जान चली गई है। मरने वालों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है, जबकि लापता लोगों की तलाश जारी है। इस भीषण त्रासदी ने न केवल नेपाल को गहरे संकट में धकेला है, बल्कि इसके कारणों को लेकर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं, जिनकी गूँज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनी जा रही है। भारत भी इस प्राकृतिक आपदा के संभावित प्रभावों और अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार की मानसूनी बारिश ने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, लेकिन सिर्फ अत्यधिक वर्षा को ही इस विनाश का एकमात्र कारण मानना जल्दबाजी होगी। कई पर्यावरणविद् और भूवैज्ञानिक ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों, विशेषकर तिब्बत से आने वाली नदियों के प्रवाह और चीनी बांधों के जल प्रबंधन पर सवाल उठा रहे हैं। नेपाल के अधिकारियों ने दबी जुबान में आरोप लगाया है कि उन्हें चीन की ओर से जलस्तर बढ़ने की पर्याप्त और समय पर चेतावनी नहीं मिली, जिससे निचले इलाकों में तैयारी का समय कम मिला। हालांकि, चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा और उसने हमेशा डेटा साझा किया है। दोनों देशों के बीच इस आरोप-प्रत्यारोप ने आपदा प्रबंधन में क्षेत्रीय सहयोग की कमी को उजागर किया है, जो भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
इस बीच, तिब्बत के जियारॉन्ग क्षेत्र में ईशा फाउंडेशन के लगभग 80 भारतीय श्रद्धालु लापता हो गए हैं, जिससे भारत में चिंता बढ़ गई है। ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु ने चीन सरकार से जियारॉन्ग तक पहुँचने की इजाजत मांगी है ताकि लापता श्रद्धालुओं की खोज और बचाव कार्य में मदद मिल सके। सद्गुरु ने एक वीडियो संदेश में भावुक अपील भी की है, जो इस त्रासदी की भयावहता को दर्शाती है। यह घटना दर्शाती है कि हिमालयी क्षेत्र में बाढ़ और भूस्खलन की समस्या का दायरा कितना व्यापक है और कैसे यह सीमा पार से आने वाली नदियों के व्यवहार से प्रभावित होती है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी नेपाल और चीन दोनों से संपर्क साधा है ताकि अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
नेपाल में फँसे भारतीय नागरिकों की संख्या भी काफी अधिक है। विभिन्न भारतीय राज्यों, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से गए कई लोग बाढ़ प्रभावित इलाकों में फंसे हुए हैं। भारत सरकार ने अपने नागरिकों की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर सक्रिय कर दिए हैं और बचाव एवं राहत कार्यों में नेपाल सरकार को हरसंभव मदद की पेशकश की है। भारतीय दूतावास लगातार नेपाल के अधिकारियों के संपर्क में है और फँसे हुए भारतीयों को सुरक्षित निकालने के प्रयास जारी हैं।
पड़ोसी देश नेपाल में आई इस भीषण बाढ़ का सीधा असर भारत के सीमावर्ती राज्यों, विशेषकर बिहार पर भी पड़ रहा है। नेपाल से निकलने वाली कोसी, गंडक, बागमती और कमला जैसी प्रमुख नदियाँ बिहार में प्रवेश करती हैं। इन नदियों में जलस्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया है, जिससे उत्तरी बिहार के कई जिलों में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। बिहार सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उच्च अलर्ट जारी किया है। राज्य के मुख्यमंत्री ने आपदा प्रबंधन एजेंसियों को पूरी तरह से सतर्क रहने और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया है। रक्षाबंधन के त्योहार के दौरान दिल्ली गए लालू परिवार सहित कई राजनेताओं ने भी बिहार को सतर्क रहने की आवश्यकता पर जोर दिया है। संभावित बाढ़ से निपटने के लिए तटबंधों की निगरानी की जा रही है और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने की योजनाएँ तैयार की जा रही हैं।
वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। बादल फटने की घटनाएँ और ग्लेशियर झीलों के फटने (GLOFs) का जोखिम बढ़ गया है, जिससे अचानक आने वाली बाढ़ (flash floods) की संभावनाएँ और भी अधिक हो गई हैं। ऐसी परिस्थितियों में, भारत, नेपाल और चीन जैसे देशों के बीच सीमा पार नदियों के डेटा साझाकरण और एक एकीकृत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली का अभाव भविष्य में और भी बड़ी आपदाओं को न्यौता दे सकता है। तत्काल राहत और बचाव कार्यों के साथ-साथ, दीर्घकालिक रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करना और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना बेहद आवश्यक है ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों के प्रभाव को कम किया जा सके। नेपाल में जीवन सामान्य पटरी पर लाने और बुनियादी ढाँचे के पुनर्निर्माण की राह लंबी और चुनौतीपूर्ण है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सहयोग अपरिहार्य होगा।
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