झारखंड BJP अध्यक्ष आदित्य साहू नजरबंद, पहली बार कटीले तार से विधानसभा की घेराबंदी, कई छात्र नेता अंडरग्राउंड - Navbharat Times
झारखंड में छात्र क्रांति का शंखनाद: विधानसभा की अभूतपूर्व घेराबंदी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नजरबंद और सड़कों पर संग्राम
झारखंड की राजधानी रांची आज एक ऐतिहासिक और उग्र छात्र आंदोलन की गवाह बनी। अपनी विभिन्न मांगों को लेकर राज्यभर से आए हजारों छात्रों ने विधानसभा घेराव का आह्वान किया, जिसने प्रदेश की कानून-व्यवस्था और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। प्रशासन ने इस आंदोलन को कुचलने और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़े कदम उठाए हैं, जिससे स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान सड़कों पर उतरा यह जनसैलाब राज्य सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
कटीले तारों का घेरा और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की नजरबंदी
झारखंड के लोकतांत्रिक इतिहास में संभवतः यह पहली बार देखा गया है जब विधानसभा की सुरक्षा के लिए कटीले तारों (Barbed Wire) का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया है। प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए विधानसभा की ओर जाने वाले हर रास्ते पर बहुस्तरीय बैरिकेडिंग की थी। आंदोलन की धार को कुंद करने के लिए पुलिस ने राजनीतिक और छात्र नेतृत्व पर भी शिकंजा कसा। इसी क्रम में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू को उनके आवास पर नजरबंद कर दिया गया, ताकि वे प्रदर्शन में शामिल न हो सकें। इसके साथ ही, पुलिस की धरपकड़ से बचने के लिए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे कई प्रमुख छात्र नेता 'अंडरग्राउंड' हो गए हैं, जिससे शासन और प्रदर्शनकारियों के बीच सीधा टकराव देखने को मिल रहा है।
रणक्षेत्र बनी रांची: छात्रों पर पानी की बौछार और बैरिकेडिंग का टूटना
जैसे-जैसे प्रदर्शनकारी विधानसभा के करीब पहुंचे, रांची की सड़कें रणक्षेत्र में तब्दील हो गईं। 'आर-पार की जंग' का नारा बुलंद करते हुए हजारों छात्रों ने सुरक्षा घेरों को चुनौती दी। जगन्नाथपुर और धुर्वा जैसे इलाकों में प्रदर्शनकारियों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेड्स को तोड़ दिया। भीड़ को तितर-बितर करने और स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए सुरक्षा बलों को वॉटर कैनन (पानी की बौछार) का सहारा लेना पड़ा। छात्रों का यह 'रिवॉल्यूशन' उस समय चरम पर था जब विधानसभा के भीतर सत्र की कार्यवाही चल रही थी। युवाओं के इस उग्र रुख ने प्रशासन को बैकफुट पर धकेल दिया है।
देवेंद्र नाथ महतो का संकल्प और छात्र नेतृत्व का बढ़ता प्रभाव
इस पूरे आंदोलन के पीछे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो की भूमिका सबसे प्रमुख बनकर उभरी है। देवेंद्र नाथ महतो ने 9 दिनों तक अनशन कर युवाओं को एकजुट करने का जो कार्य किया, उसकी तुलना राज्य के अन्य समकालीन आंदोलनों से की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महतो का यह अनशन सरकार पर दबाव बनाने में काफी हद तक सफल रहा है। विधानसभा के बाहर छात्रों का जुटना और कड़ाके की सुरक्षा के बावजूद अपनी आवाज बुलंद करना यह दर्शाता है कि राज्य के युवाओं में रोजगार और स्थानीय नीतियों को लेकर गहरा असंतोष है।
निष्कर्ष
झारखंड में जारी यह छात्र आंदोलन केवल एक तात्कालिक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह राज्य की भविष्य की राजनीति का संकेत भी है। एक तरफ जहां सरकार इसे विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित बता रही है, वहीं दूसरी ओर छात्रों का स्वतः स्फूर्त जुड़ाव कुछ और ही कहानी बयां करता है। विधानसभा के बाहर कटीले तार और सड़कों पर पानी की बौछारें लोकतंत्र के लिए नए सवाल खड़े कर रही हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि हेमंत सोरेन सरकार इन उग्र प्रदर्शनकारियों के साथ संवाद का रास्ता चुनती है या फिर दमनकारी नीतियों के जरिए इस 'छात्र क्रांति' को दबाने का प्रयास करती है।
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