उज्जैन में 650 साल पुरानी शाही मस्जिद के हिस्से को हटाने के ख़िलाफ़ याचिका हाई कोर्ट में ख़ारिज - bbc.com
उज्जैन की शाही मस्जिद विवाद: हाई कोर्ट ने ध्वस्तिकरण के ख़िलाफ़ याचिका ख़ारिज की, तनाव बरकरार
उज्जैन, मध्य प्रदेश: धार्मिक नगरी उज्जैन में 650 साल पुरानी ऐतिहासिक शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने के प्रशासन के फैसले के ख़िलाफ़ दायर याचिका को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया है। इस फैसले के साथ ही मस्जिद के विवादित हिस्से पर प्रशासनिक कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है, जिससे स्थानीय मुस्लिम समुदाय में चिंता और तनाव का माहौल गहरा गया है, वहीं प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की है।
यह पूरा मामला शाही मस्जिद के एक हिस्से को लेकर है, जिसे प्रशासन कथित तौर पर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण बता रहा है। प्रशासन का तर्क है कि यह हिस्सा महाकाल लोक कॉरिडोर के विस्तार या किसी अन्य सार्वजनिक परियोजना के रास्ते में आ रहा है, या इसका निर्माण अवैध रूप से सरकारी जमीन पर किया गया है। दूसरी ओर, मस्जिद समिति और मुस्लिम समुदाय का कहना है कि यह मस्जिद सदियों पुरानी है और इसका हर हिस्सा धार्मिक महत्व रखता है। उनका दावा है कि यह अतिक्रमण नहीं है, बल्कि मस्जिद का अभिन्न अंग है, जिसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। इस विवाद ने पिछले कुछ समय से उज्जैन में धार्मिक और सामाजिक तनाव को बढ़ावा दिया है।
याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में दलील दी थी कि मस्जिद का यह हिस्सा उसकी वास्तुकला और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण अंग है। उन्होंने ध्वस्तिकरण को रोकने की मांग करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन बताया था। याचिका में मस्जिद के 650 साल पुराने इतिहास और उसकी सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने की गुहार लगाई गई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, प्रशासन के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने संभवतः इस मामले को अतिक्रमण से संबंधित एक सिविल विवाद माना और प्रशासन की कार्रवाई को कानूनी दायरे में पाया, जिससे याचिका को निरस्त कर दिया गया। न्यायालय का यह निर्णय प्रशासनिक प्राधिकारों को अपने विकास और अतिक्रमण विरोधी अभियानों को जारी रखने की अनुमति देता है।
इस फैसले के बाद उज्जैन में तनाव और भी बढ़ गया है। मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने इस निर्णय पर निराशा व्यक्त की है, जबकि प्रशासन ने किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए शहर में पुलिस बल तैनात कर दिया है। हाल के दिनों में इस मुद्दे पर कई विरोध प्रदर्शन और प्रदर्शन हुए हैं, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी जैसे धर्मगुरुओं ने हिंसा के बजाय कानून के दायरे में रहकर समाधान खोजने का आह्वान किया है। उन्होंने जोर दिया है कि किसी भी मसले का हल हिंसा नहीं हो सकती और सभी पक्षों को शांति बनाए रखनी चाहिए।
इस विवाद में राजनीतिक बयानबाजी भी खूब हुई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस मामले पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे मस्जिद को 'शहीद' करने का प्रयास बताया था, जिससे लोगों की भावनाएं भड़क उठी थीं। हालांकि, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सनवर पटेल ने ओवैसी के बयानों का खंडन करते हुए स्पष्ट किया था कि उज्जैन की शाही मस्जिद को 'शहीद' नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा था कि यह मामला अतिक्रमण से जुड़ा है और प्रशासन केवल अवैध रूप से निर्मित हिस्से को हटाने की बात कर रहा है, न कि पूरी मस्जिद को ध्वस्त करने की। पटेल ने समुदाय से शांति बनाए रखने और अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की थी।
उज्जैन पुलिस प्रशासन, जिसमें आईपीएस प्रदीप शर्मा जैसे अधिकारी शामिल हैं, ने पिछले कई हफ़्तों से शहर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सिंहस्थ-2028 जैसी भविष्य की मेगा-आयोजनों को ध्यान में रखते हुए, प्रशासन एआई पुलिसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग कर रहा है ताकि किसी भी तरह की अशांति को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सके। हाई कोर्ट के फैसले के बाद, प्रशासन ने और अधिक सतर्कता बरती है, ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके और शांतिपूर्ण माहौल सुनिश्चित किया जा सके। इस फैसले के बाद, अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब और कैसे इस विवादित हिस्से को हटाने की कार्रवाई करता है और समुदाय की प्रतिक्रिया क्या होती है। शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की गई है।
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